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वासेपुर एके-47 फायरिंग केस: 22 साल बाद तीन दोषियों को उम्रकैद की सजा

धनबाद की अदालत ने 29 जनवरी 2004 को फहीम खान के घर पर हुई एके-47 फायरिंग के मामले में 3 अक्टूबर को तीन दोषियों को उम्रकैद और 20-20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

अदालत कक्ष में मेज़ पर रखा लकड़ी का हथौड़ा और कानूनी किताबें (प्रतीकात्मक तस्वीर)
प्रतीकात्मक तस्वीर। फ़ोटो: Joe Gratz / विकिमीडिया कॉमन्स (CC0 1.0)

झारखंड के धनबाद में वासेपुर के बहुचर्चित एके-47 गोलीकांड में लगभग 22 वर्ष बाद अदालत का फैसला आ गया है। 3 अक्टूबर को जिला एवं सत्र न्यायाधीश (तृतीय) पारस कुमार सिन्हा की अदालत ने इस मामले में शाहिद आलम, शहादत हुसैन और तनवीर आलम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही हर दोषी पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। यह केस 29 जनवरी 2004 को फहीम खान के आवास को निशाना बनाकर की गई फायरिंग से जुड़ा है, जिन्हें स्थानीय रिपोर्टों में वासेपुर का गैंगस्टर बताया जाता है।

अदालत ने 28 सितंबर को ही तीनों को दोषी ठहरा दिया था और सजा तय करने के लिए 3 अक्टूबर की तारीख रखी थी। उस दिन सजा के बिंदु पर बहस पूरी होने के बाद उम्रकैद का फैसला सुनाया गया। फैसले की जानकारी अधिवक्ता शाहबाज सलाम ने दी।

2004 की उस गोलीबारी में क्या हुआ था

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 29 जनवरी 2004 को हमलावरों ने वासेपुर के कमर मखदूमी रोड पर बने फहीम खान के मकान पर एके-47 से कई राउंड गोलियां दागी थीं। अचानक शुरू हुई फायरिंग से पूरे इलाके में दहशत फैल गई। जान बचाने के लिए फहीम खान बगल वाले मकान की छत पर कूद गए, जिसमें उनका पैर टूट गया। उनके अंगरक्षक विनोद शर्मा को गोलियां लगीं और उन्होंने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया। विनोद शर्मा मूल रूप से बिहार के अरवल जिले के निवासी थे।

रिपोर्टों के मुताबिक, इस गोलीबारी में हमलावरों की तरफ से मौजूद शाहिद आलम के पैर में भी गोली लगी थी। वारदात के बाद जब हमलावर भाग रहे थे, तब पुलिस ने उनका पीछा किया। प्रभात खबर के अनुसार, इसी दौरान हुई मुठभेड़ में सुल्तान नाम का एक अपराधी मारा गया था। ईटीवी भारत की रिपोर्ट बताती है कि तनवीर आलम पटना और शहादत हुसैन वासेपुर का निवासी है।

अमर उजाला के मुताबिक, अदालत ने तीनों को हत्या, हत्या की कोशिश, आपराधिक षड्यंत्र, अवैध जमावड़े और आर्म्स एक्ट से जुड़ी धाराओं में दोषी माना। उम्रकैद के अलावा आर्म्स एक्ट के तहत सात वर्ष और हत्या की कोशिश के लिए दस वर्ष के कारावास की सजा भी दी गई है। अदालत के आदेश के अनुसार ये सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

2004 की यह वारदात धनबाद की उस दौर की सबसे चर्चित आपराधिक घटनाओं में गिनी जाती है। एके-47 जैसे हथियार के इस्तेमाल और एक अंगरक्षक की मौत के कारण यह मामला लंबे समय तक सुर्खियों में रहा। दो दशक से अधिक समय तक चली सुनवाई के बाद आए इस फैसले से यह पुराना केस एक बार फिर चर्चा में है।

प्रतीकात्मक तस्वीर। फ़ोटो: Joe Gratz / विकिमीडिया कॉमन्स (CC0 1.0)

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